Wednesday, 21 December 2016

कब तक अम्बेडकर

'सक्रिय राजनीति में जैसे जैसे दलितों की संख्या बढ़ेगी , वैसे वैसे दलित उत्थान की संभावनाओं को मजबूती मिलेगी'-ऐसा मैं कुछ समय पहले तक सोचता था, लेकिन अब मुझे इस विचार पर संदेह होने लगा है, कारण है, मुझे उच्च जातियों और उनके तथाकथित नेताओं से तो आशा नहीं थी , पर विराट संघर्ष करके राजनीति में आये दलित नेताओं से यह आशा थी कि वे बेहतर नेता के साथ साथ बेहतर  मनुष्य बन कर दिखाएँगे, वो बाबा साहेब के सिधान्तो पर चलने का प्रयास करेंगे, संविधान में बाबा साहेब के लिखे अधिकार लेकर ही दम लेंगे, पर हुआ इसके एकदम उलट, दलित नेताओं की तो कार्य संस्कृति ही बदल चुकी है, मायावती जी को ही ले वह दलित उत्थान की  बात अब सिर्फराजनीतिक फायदे के ही लिए करती है, इससे तो बेहतर था कि वो किसी गाँव में रहती और गाँव के लोगों में आधुनिक चेतना का संचार करती।'
अब प्रश्न यह उठता है की क्या दलितों का सत्ता में आना बुरा है ? 
'माफ कीजिए, आप मेरी बातों का उलटा अर्थ लगा रहे हैं। कहीं आप सवर्ण तो नहीं हैं? मैंने कब सत्ता का विरोध किया ? मैं तो चाहता हूँ कि दलित बड़ी संख्या में सत्ता में आएँ। इसके बिना उनकी हालत सुधर नहीं सकती। यही सोच कर पूना पैक्ट को आंबेडकर जी ने  स्वीकार कर लिया था। लेकिन दलित भी सत्ता का उपयोग उन्हीं उद्देश्यों के लिए कर रहे है , जिनके लिए सवर्ण जातियाँ सत्ता का उपयोग करती हैं, तब तो साधारण दलितों की हैसियत बदलने से रही। भेड़ों की पीठ पर चढ़ कर एक भेड़ ने आसमान छू लिया, तो इससे नीचे की भेड़ों को क्या मिला? उन पर तो नेता का बोझ ही बढ़ा। यह बोझ वे कब तक उठाते रहेंगे ?'
रही बात इस मिटटी को आंबेडकर की जरुरत की तो लगभग हर 10वे पार्क और चौराहे पर तो आंबेडकर विराजमान है ही, खैर छोडो, हमें क्या हमें तो चाय पी के सोना है, रात भी बहुत हो चली है सोता। मेरा देश तो लगातार बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है

माफीनामा

किसी को किसी की गलती से हुई भूल के लिए माफ़ ना करना ठीक वैसा ही है जैसा जहर खुद पीना और उम्मीद करना कि इसका प्रभाव दुसरे पर हो, हो सकता है जब भूल हुई हो उस समय उस इंसान को साथ ऐसी परिस्थितियां ने घेरा हुआ हो जहाँ इंसानी दिमाग काम करना बिलकुल बंद कर देता है,इंसान क्षण भर के लिए स्वार्थी हो जाता है लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि ये उस इंसान का वास्तविक स्वभाव है,अगर अपराधी का इतिहास अच्छा है और गलती से कोई क्रोधवस कोई भूल कर देता है तो सुप्रीम कोर्ट भी उस अपराधी की सजा कम कर देता है, Sacrifice करने से व्यक्ति अपने लक्ष्य तक पहुँचता है, पहले यही सोचता था लेकिन sacrifice करने से अपनी खुसी दिन ब दिन मर रही हो तो उस sacrifice की भी कोई value नही होती,ऐसा sacrifice धीरे धीरे frustration का रूप ले लेता है,माफ़ करना अँधेरे कमरे में रौशनी करने जैसा होता है,इस रौशनी से गलती करने वाले व्यक्ति को इतना प्रकाश मिलता है कि उसे अपनी अच्छाइयों को साबित करने का एक और मौका मिल जाता है,अकेलापन तो पहले से ही था अब निरर्थक sacrifice ने अधूरापन उपहार में दे दिया,और भूलवश की हुई गलती से उत्पन्न हुआ अधूरापन अकेलेपन से मिल जाये तो इंसान की स्थिति बद से बदतर होती जाती है,आज हर सेकंड जब तुम्हारी कमी खलती है तो तुम्हारी जरुरत महसूस होती है, तुम्हारी जरुरत ही मेरा तुमसे आकर्षण है और इस आकर्षण से ही लक्ष्य को पाया जा सकता है बस,माफ़ करना और ना करना, निस्संदेह ये तुम्हारा निर्णय है, लेकिन सिर्फ एक भूलवश और भविष्य के अज्ञान से लिये गए sacrifice वाले निर्णय से हमारी दोस्ती को मत तोलना,स्वार्थी नही सहयोगी बनने का प्रण लिया था,लेकिन इंसान हूँ,परिस्थितियां ऐसी थी हो गयी गलती, अगर कर सको तो माफ़ कर दे