'सक्रिय राजनीति में जैसे जैसे दलितों की संख्या बढ़ेगी , वैसे वैसे दलित उत्थान की संभावनाओं को मजबूती मिलेगी'-ऐसा मैं कुछ समय पहले तक सोचता था, लेकिन अब मुझे इस विचार पर संदेह होने लगा है, कारण है, मुझे उच्च जातियों और उनके तथाकथित नेताओं से तो आशा नहीं थी , पर विराट संघर्ष करके राजनीति में आये दलित नेताओं से यह आशा थी कि वे बेहतर नेता के साथ साथ बेहतर मनुष्य बन कर दिखाएँगे, वो बाबा साहेब के सिधान्तो पर चलने का प्रयास करेंगे, संविधान में बाबा साहेब के लिखे अधिकार लेकर ही दम लेंगे, पर हुआ इसके एकदम उलट, दलित नेताओं की तो कार्य संस्कृति ही बदल चुकी है, मायावती जी को ही ले वह दलित उत्थान की बात अब सिर्फराजनीतिक फायदे के ही लिए करती है, इससे तो बेहतर था कि वो किसी गाँव में रहती और गाँव के लोगों में आधुनिक चेतना का संचार करती।'
अब प्रश्न यह उठता है की क्या दलितों का सत्ता में आना बुरा है ?
'माफ कीजिए, आप मेरी बातों का उलटा अर्थ लगा रहे हैं। कहीं आप सवर्ण तो नहीं हैं? मैंने कब सत्ता का विरोध किया ? मैं तो चाहता हूँ कि दलित बड़ी संख्या में सत्ता में आएँ। इसके बिना उनकी हालत सुधर नहीं सकती। यही सोच कर पूना पैक्ट को आंबेडकर जी ने स्वीकार कर लिया था। लेकिन दलित भी सत्ता का उपयोग उन्हीं उद्देश्यों के लिए कर रहे है , जिनके लिए सवर्ण जातियाँ सत्ता का उपयोग करती हैं, तब तो साधारण दलितों की हैसियत बदलने से रही। भेड़ों की पीठ पर चढ़ कर एक भेड़ ने आसमान छू लिया, तो इससे नीचे की भेड़ों को क्या मिला? उन पर तो नेता का बोझ ही बढ़ा। यह बोझ वे कब तक उठाते रहेंगे ?'
रही बात इस मिटटी को आंबेडकर की जरुरत की तो लगभग हर 10वे पार्क और चौराहे पर तो आंबेडकर विराजमान है ही, खैर छोडो, हमें क्या हमें तो चाय पी के सोना है, रात भी बहुत हो चली है सोता। मेरा देश तो लगातार बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है
अब प्रश्न यह उठता है की क्या दलितों का सत्ता में आना बुरा है ?
'माफ कीजिए, आप मेरी बातों का उलटा अर्थ लगा रहे हैं। कहीं आप सवर्ण तो नहीं हैं? मैंने कब सत्ता का विरोध किया ? मैं तो चाहता हूँ कि दलित बड़ी संख्या में सत्ता में आएँ। इसके बिना उनकी हालत सुधर नहीं सकती। यही सोच कर पूना पैक्ट को आंबेडकर जी ने स्वीकार कर लिया था। लेकिन दलित भी सत्ता का उपयोग उन्हीं उद्देश्यों के लिए कर रहे है , जिनके लिए सवर्ण जातियाँ सत्ता का उपयोग करती हैं, तब तो साधारण दलितों की हैसियत बदलने से रही। भेड़ों की पीठ पर चढ़ कर एक भेड़ ने आसमान छू लिया, तो इससे नीचे की भेड़ों को क्या मिला? उन पर तो नेता का बोझ ही बढ़ा। यह बोझ वे कब तक उठाते रहेंगे ?'
रही बात इस मिटटी को आंबेडकर की जरुरत की तो लगभग हर 10वे पार्क और चौराहे पर तो आंबेडकर विराजमान है ही, खैर छोडो, हमें क्या हमें तो चाय पी के सोना है, रात भी बहुत हो चली है सोता। मेरा देश तो लगातार बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है
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