मैं एक लंबी छुट्टी पर जाना चाहता हूँ,वो भी अकेला,मेरे साथ कोई न जाये बस मैं जाऊँ, इस यात्रा में मेरे दिल और दिमाग खाली जाये न दिल में मेरे साथ कोई जाये न दिमाग में कोई साथ रहे,इतनी एकांत जगह में जाऊँ जहाँ मुझे दूर दूर तक कोई भी न दिखे,मेरी आँखे थक जाये किसी को ढूंढते और फिर थक कर ढूंढना छोड़ दे, मेरी आँखे सिर्फ मुझे देखे मुझे पहचानती रहे मुझे जाने और मुझे बताये कि मैं कौन हूँ,सही और गलत के पार,झूठ और सच से परे कोई ऐसी जगह तो होगी जहाँ मैं अपने आप को खुद जान सकूँ,जहां कोई मुझे ये बताने वाला न हो कि तू ये है तुझे ये करना चाहिए,तूने ये गलत किया,क्या मेरा दिल,मेरा दिमाग, मेरी खुद की जुबान मुझे बता सकती है कि मैं क्या हूँ, मैं क्यों हूँ,मैं किस लिए हूँ, मई किसके लिए हूँ,क्या मैं खुद से थक रहा हूँ, क्या मैं खुद से भाग रहा हूँ या मुझे डरा के भगाया जा रहा है या जबरदस्ती अहसास कराया जा रहा है कि तू थक गया है अब बस वो कर जो हम कहें,तुम्हारे कहने से ही तो अब तक मैं सबकुछ करता रहा हूँ, तुम अपने आप को नही पहचान रहे या मैं अपने आप को नही पहचान रहा,तुम अपने आप को देखो मुझे क्यों देखते हो,मेरे लिए औरो को क्यों देखते हो,मेरी तुलना दूसरो से क्यों करते हो और तुलना करके मुझे परिणाम क्यों बताते हो और मेरा परिणाम हमेसा बुरा क्यों बताते हो,मुझे चले जाने दो,मुझे जाने के लिए तुमसे उस जगह के बारे में भी नही पूछना,वो मेरी जगह है मैं खुद ढूंढ लूंगा,अब तो वो जगह भी मुझे बुलाने लगी है,तब ही तो हर समय काले कागज पर काले पेन से अपना पता लिख देती है और कहती है ढूंढ ले इसमें अपना रास्ता और आजा और जान ले तू कौन है ?
क्या मैं पागल हो रहा हूँ, ऐसा तो नही सही होने के लिए पागल हो रहा हूँ या ऐसा भी हो सकता है की तुमने पागल कर दिया हो बस अब सही होना चाह रहा हूँ,मैं खुद से क्यों इतनी बाते करता रहता हूँ खुद से बाते करके हो क्या जायेगा मेरा, मुझे क्यों अच्छा लगता है खुद से बाते करना,कहीं खुद से बाते करके मैं अपना समय तो बर्बाद नही कर रहा,वैसे मैं तुमसे बाते करके ही क्या सीख जाता,क्या उखाड़ लेता इस दुनिया का तुमसे बात करके,मैं शांत क्यों नही रह पाता, दिन हो या रात हो किस चीज की हडबडी मची रहती है मुझे,ऐसा तो नही कोई मेरी प्रिय चीज मुझे नही मिली हो उसकी कमी तो नही खलती मुझे,
पहनने के लिए कपड़ा है,रहने के लिए घर है,माँ है बाप है भाई बहन सब तो है,फिर किसकी कमी खल रही है मुझे,मैं क्यों उस एकांत जगह में जाना चाहता हूँ,अगर वहां चला गया वहां भी तुम्हारी कमी पूरी नही हुई तो ?
ये इतनी चिंता क्यों होती है मुझे,मैं रिस्क लेने से डर क्यों रहा हूँ,क्या डर रहा हूँ इसलिए ही तो इतना बेचैन तो नही हूँ.तुम्हारे जैसे और भी तो लोग है मेरी जिंदगी में क्या वो तुम्हारी कमी पूरी नही कर पर रहे हैं,
क्या वो तुम्हारे जैसे नही है, तुम्हारा जैसा सर्फ एक तुम हो ?
बताओ तो तुम्हे मैं कहाँ ढूंढू ?
क्या मैं पागल हो रहा हूँ, ऐसा तो नही सही होने के लिए पागल हो रहा हूँ या ऐसा भी हो सकता है की तुमने पागल कर दिया हो बस अब सही होना चाह रहा हूँ,मैं खुद से क्यों इतनी बाते करता रहता हूँ खुद से बाते करके हो क्या जायेगा मेरा, मुझे क्यों अच्छा लगता है खुद से बाते करना,कहीं खुद से बाते करके मैं अपना समय तो बर्बाद नही कर रहा,वैसे मैं तुमसे बाते करके ही क्या सीख जाता,क्या उखाड़ लेता इस दुनिया का तुमसे बात करके,मैं शांत क्यों नही रह पाता, दिन हो या रात हो किस चीज की हडबडी मची रहती है मुझे,ऐसा तो नही कोई मेरी प्रिय चीज मुझे नही मिली हो उसकी कमी तो नही खलती मुझे,
पहनने के लिए कपड़ा है,रहने के लिए घर है,माँ है बाप है भाई बहन सब तो है,फिर किसकी कमी खल रही है मुझे,मैं क्यों उस एकांत जगह में जाना चाहता हूँ,अगर वहां चला गया वहां भी तुम्हारी कमी पूरी नही हुई तो ?
ये इतनी चिंता क्यों होती है मुझे,मैं रिस्क लेने से डर क्यों रहा हूँ,क्या डर रहा हूँ इसलिए ही तो इतना बेचैन तो नही हूँ.तुम्हारे जैसे और भी तो लोग है मेरी जिंदगी में क्या वो तुम्हारी कमी पूरी नही कर पर रहे हैं,
क्या वो तुम्हारे जैसे नही है, तुम्हारा जैसा सर्फ एक तुम हो ?
बताओ तो तुम्हे मैं कहाँ ढूंढू ?
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