Saturday, 4 November 2017

फेसबुक : गुलामों का अड्डा

लिखना' और 'फेसबुक पर लिखना' दो अलग अलग बातें है.लिखना एक कला है,एक नशा है,एक अच्छी आदत है पर फेसबुक पर लिखना गुलामी का प्रतीक होता जा रहा है.तुम जितना ज्यादा फेसबुक पर लिखोगे,जितना ज्यादा फेसबुक को समय दोगे तो समझ लो तुम उतने ही ग़ुलाम हो,3 साल 5 महीने से राजनैतिक मुद्दों पर लिखने लगे तो समझते हो कि तुम अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हो रहे हो.
घण्टा जागरूक हो रहे हो,चूतियापा कट रहा है तुम्हारा,2014 से पहले तो तुम नही लिखते थे अब अचानक अंदर का 'लेखत्व' कैसे जाग गया.फेसबुक पर दो पैसे की आशिकी से भरपूर शायरियाँ चेपने वाला लड़का आज एकदम से राजनैतिक विचारक कैसे बन गया ? जिसकी कोई फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट नही करता था आज उसकी फ्रैंडलिस्ट में 5000 दोस्त और 1200+ फोलोवर्स कैसे हो गए ? क्या कभी सोचा है ?
दरअसल, तुम्हारा 'लेखत्व' जागा नही है जगाया गया है,ऊपर वालो ने जगाया है अपना फायदा उठाने के लिए,वो सांप भी मार रहे है और लाठी भी नही टूटने दे रहे.फेसबुक पर लिखना 'बेरोजगारी का सबसे घृणित रूप' कब बन गया किसी को पता ही नही चला,फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उद्भव इसलिये हुआ था ताकि आम जनमानस अपनी परेसानियों को सीधे सरकार को अवगत करा सके,एक दुसरे के साथ बाँट सके,अपनी अच्छी यादों को संजो सके,बुरे वक़्त में मित्रो से दुआ ले सके,लेकिन अगर आज किसी को सरकार से कोई परेसानी है और उसे वो फेसबुक पर शेयर करे तो तुम उसे ही ट्रोल करने लगते हो.
अगर तुम्हे लगता है जो तुम सोच रहे हो वो लिख रहे हो,
नही,
तुम वो लिख रहे हो जो वो लिखवाना चाह रहे हैं,वो जानते है कि भारत का एजुकेशन सिस्टम 'क्लर्क' तैयार करता है इसलिए वो बयान देते है और तुम उन पर निबंध लिखते हो,बेजा कुतर्क करते हो लेकिन कभी ये नही सोचते कि हमारी बेरोजगारी परदे के पीछे छिपा दी गयी है ,नौकरी न मांगने लगे इसलिए नया रोजगार दे दिया है -' फेसबुक पर लिखना'
जनता तो 'भक्त' है और भक्त 'चूतिया' पहले होता है 'भावुक' बाद में,भक्त का क्या है वो एक कोरे फ़ेसबुकिया को 'लेखक' मान बैठता है और कोरा फ़ेसबुकिया अपने लक्ष्य को छोड़ के लेखक बनने का ही सपना पालने लगता है यहीं से रोजगार परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है और इसी में उनकी जीत होती है क्यूंकि वो तुम्हे तुम्हारे वास्तविक उद्देश्य से हटा चुके होते हैं .अगर तुम्हे लगता है कि तुम्हारा लिखना 'बौद्धिक विलास' है इससे तुम्हारी बल-बुद्धि विकसित हो रही है तो गलत लग रहा है तुम्हे, वास्तविकता में 'बौद्धिक जुगाली' वो कर रहे है और निशुल्क तुमसे लिखा लिखा कर ही ग़ुलामी करा रहे हैं.
किसी बकचोद ने कह दिया कि ताजमहल खूबसूरत कब्रिस्तान है तो क्या उसके कहने से कब्रिस्तान हो गया,उनकी सोच तो मुग़ल काल के बारे में जग-जाहिर है ये तुम भी जानते हो तो फिर भी इन बेवजह के मुद्दे पर क्यों लिखते हो,असल में पहले वो तुमसे ताजमहल पर बुरा-भला लिखवायेंगे और फिर तुम्हारे हाथ से ही ताजमहल को तुड़वा भी देंगे और ये सब तुम निशुल्क करोगे भी.
इसलिए 'समझदार बनो ग़ुलाम नही', तुम जितने समझदार बनोगे उनके लिए उतने ही गद्दार बनोगे,वो तुम्हे 'गद्दार' का तगमा देकर डराएंगे लेकिन डरना मत इसी 'समझदारी भरी गद्दारी' से ही कोई नया आईडिया आयेगा,और नया विकल्प आयेगा,नया आईडिया दिमाग में तब ही आता है जब कोई अकेला रहता है,अकेले बौद्धिक जुगाली करता है इसलिए कभी अकेले रहो कुछ नया सोचो वरना फेसबुक पर तो उनकी निशुल्क भाड़े पर बुलाई भीड़ ही मिलेगी और ये तुम खुद तय करो कि भीड़ के साथ जाना है या अलग खुद की बनाई राह पर क्यूंकि भीड़ तो अंत में भाड़ में ही जाती है

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