Saturday, 4 November 2017

पहले समाज ने डराया फिर हराया.

ये तो तुम जानती ही हो क़ि मैंने तुमसे प्यार किया और तुम्हे पाने के लिए खूब कोशिस की,सोचता था कि तुम ही वो लड़की हो जिसे भगवन ने सिर्फ मेरे लिये बनाया है मतलब मेरा 'नसीब' हो तुम,
 सुना था कि कोशिशों की अधिकता के सामने नसीब को भी झुकना पड़ता है,
 इसलिए कि एक दिन तुम्हारा 'न' 'हाँ' में जरूर बदलेगा,यही सोच के तुम्हे पाने की कोशिश करता रहा,एक साल,दो साल,तीन साल,चार साल,साल निकलते रहे मैं तुम्हे पाने के लिए तड़पता रहा,अपना काम करता रहा,पर तुमने कभी नही कुबूला की तुम भी मुझसे प्यार हो,
पहले सोचा,शायद तुम किसी से उतना ही प्यार करती हो जितना मैं तुमसे करता हूँ,इसलिए तुम मुझसे प्यार नही कर पा रही
हो सकता ऐसा मेरा सोचना गलत हो,क्या पता सही भी ही,हो सकता है पूरी तरह गलत हो,क्या सच है ये सिर्फ तुम जानती हो,इसलिए
मैंने बहुत सोर्स से उस लड़के की ढूंढने की कोशिस की पर मुझे वो लड़का नही मिला.
अब जब और गहराई में जाके सोचा,पुरानी अपनी दोनों की सब यादें याद की,उस दौर को याद किया जब मैं सच में खुश रहता था तो पता चला कि तुम्हारी जिंदगी में कोई और लड़का होता तो मुझे तुम अपना इतना वक़्त क्यू देती,उसी को देती न,
जितना अपना वक़्त मैंने तुम्हे दिया उतना ही तुमने अपना वक़्त मुझे दिया.
इसलिए यह तो मान लिया कि कोई और लड़का तो नही है
तुम्हारी 'हाँ' न कहने की वजह कोई दूसरी ही है
फिर शुरू से सोचा,
 तुम्हारे आस पास के समाज को ध्यान से देखा,तुम उस समाज में रही जहां लड़कियो को पढ़ने की आज़ादी तो है,पर अपने खुद के निर्णय लेने की आज़ादी नही है,तुम्हारे पढ़ने की आज़ादी का भी तुम्हे बार बार ताना मारा जाता है जिससे कि तुम कोई नई मांग न करने लग जाओ,सिर्फ पढ़ाई की आज़ादी देके तुम्हारी सब इच्छाएं मार दी जाती हैं,
ऐसे समाज में इंसांन को 'आदर्श' बनने का सपना दिखाया जाता है,छोटे भाई-बहिन के लिए आदर्श,रिश्तेदारो के लिए आदर्श,गली मोहल्लों वालों के लिए आदर्श,हर कंडीशन में सिर्फ आदर्षता दिखनी चाहिए,कभी खुद के निर्णय लेने की पॉवर तुम्हे नही दी गयी,तुम्हारी खुद की बॉडी तुम् किसको शौंपना चाहती हो ये भी तुम्हे अधिकार नही है ये अधिकार भी तुम्हारे पिता जी के हाथों में सुरक्षित है क्यूकि शादी के लिए लड़का तो वो ही ढूंढेंगे,पता है सोशल मीडिया का तुम्हे अहसान मानना चाहिए क्योंकि आज जब भी तुम्हारा मन होता है तो तुम फोन उठाती हो और बात कर लेती हो.सोशल मीडिया न होती तो आज तुम्हारे दोस्त सिर्फ वो लोग होते जो तुम्हारे पिता जी को पसन्द होते,पिता जी की पसन्द सिर्फ लड़कियां होती उनमे भी वो लड़कियां जो उनकी लड़की की परिभाषा में एकदम फिट बैठती हो,कम बोलती हो,घर से कम बाहर निकलती हो, ऊपर से टॉपर हो,मतलब वही कि आदर्श हो,तुम्हारे इस समाज से अच्छा तो ये सोशल मीडिया है जो पढ़ाई की आज़ादी के तुम्हे पता नही और क्या क्या आज़ादी देता है,
तुम मुझसे कभी हाँ नही कहपायी पता है क्यों क्योंकि तुम्हे आदर्श बनने का सपना दिखा दिया था समाज ने,रास्ता बना दिया गया था उस रस्ते के कुछ नियम भी थे,तुम तो बस उस रस्ते पर चल रही थी,तुम उस रस्ते का कोई भी नियम नही तोड़ना चाहती थी इसलिए कभी तुम हाँ नही कहपायी,
मैंने कसम खा रखी थी कि तुम्हे पाकर रहूंगा,और मैं बहुत जिद्दी हूँ जो भी चाहता हूँ उसे पाकर रहता हूँ,फिर भी मैंने तुम्हारे केश में गिव उप कर दिया क्योंकि मैं हार गया था,तुमसे नही,इस समाज से हार गया,उस समाज से हार गया जिसने अपने ही बच्चों को अपने खुद के ही निर्णय लेने की आज़ादी नही दी.
तुमने कभी हाँ नही बोला इसमें तुम्हारी तो कभी गलती थी ही नही पूरी गलती समाज की है
समाज ने तुमसे अपने नियम मनवाने के लिए तुम्हे इस तरह से जकड रखा है कि कभी तुम मुझसे या किसी और से हाँ बोलने की सोच भी नही सकती,क्योंकि ये नियम सदियो पहले patriarchal समाज ने बनाये थे तब से ही चलते आ है
पर्सनली मत लेना ये सब,बहुत लडकिया इस कंडीशन को फेस कर रही है,जो मै सोच रहा हूँ वो मैंने लिखा,तुम्हारे पिता जी का मैंने अपमान नही किया है मैं आज भी उनका बहुत सम्मान करता हूँ उनकी गलती नही है वो भी नियमो का पालन करते आ रहे हैं.तुम्हे अगर ये नियम गलत लगते हों तो तोड़ने की कभी कोशिस करना,खुली  आबोहवा में सांस लेके देखना,बहुत अच्छा लगता  है,बाकि तुम्हारी मर्जी जिंदगी तो कट ही रही है, मेरे विचार तुम्हे गलत लगे हों तो पढ़ के डिलीट कर देना और हाँ ये विचार गलत हो सकते है पर प्यार 'सच्चा' ही था.

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