किसी को किसी की गलती से हुई भूल के लिए माफ़ ना करना ठीक वैसा ही है जैसा जहर खुद पीना और उम्मीद करना कि इसका प्रभाव दुसरे पर हो, हो सकता है जब भूल हुई हो उस समय उस इंसान को साथ ऐसी परिस्थितियां ने घेरा हुआ हो जहाँ इंसानी दिमाग काम करना बिलकुल बंद कर देता है,इंसान क्षण भर के लिए स्वार्थी हो जाता है लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि ये उस इंसान का वास्तविक स्वभाव है,अगर अपराधी का इतिहास अच्छा है और गलती से कोई क्रोधवस कोई भूल कर देता है तो सुप्रीम कोर्ट भी उस अपराधी की सजा कम कर देता है, Sacrifice करने से व्यक्ति अपने लक्ष्य तक पहुँचता है, पहले यही सोचता था लेकिन sacrifice करने से अपनी खुसी दिन ब दिन मर रही हो तो उस sacrifice की भी कोई value नही होती,ऐसा sacrifice धीरे धीरे frustration का रूप ले लेता है,माफ़ करना अँधेरे कमरे में रौशनी करने जैसा होता है,इस रौशनी से गलती करने वाले व्यक्ति को इतना प्रकाश मिलता है कि उसे अपनी अच्छाइयों को साबित करने का एक और मौका मिल जाता है,अकेलापन तो पहले से ही था अब निरर्थक sacrifice ने अधूरापन उपहार में दे दिया,और भूलवश की हुई गलती से उत्पन्न हुआ अधूरापन अकेलेपन से मिल जाये तो इंसान की स्थिति बद से बदतर होती जाती है,आज हर सेकंड जब तुम्हारी कमी खलती है तो तुम्हारी जरुरत महसूस होती है, तुम्हारी जरुरत ही मेरा तुमसे आकर्षण है और इस आकर्षण से ही लक्ष्य को पाया जा सकता है बस,माफ़ करना और ना करना, निस्संदेह ये तुम्हारा निर्णय है, लेकिन सिर्फ एक भूलवश और भविष्य के अज्ञान से लिये गए sacrifice वाले निर्णय से हमारी दोस्ती को मत तोलना,स्वार्थी नही सहयोगी बनने का प्रण लिया था,लेकिन इंसान हूँ,परिस्थितियां ऐसी थी हो गयी गलती, अगर कर सको तो माफ़ कर दे
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