Wednesday, 15 November 2017

विराट कोहली के नाम एक खुला ख़त

An open Letter to Virat Kohli
डिअर विराट कोहली,
मैं जानता हूँ तुम्हारे करोड़ों fans है देश में विदेश मे,उन्ही करोड़ों fans में से एक मैं भी हूँ और 2009 से ही तुम्हारा बहुत बड़ा फैन रहा हूँ,स्कूल,कॉलेज के दिनों से ही तुम्हारे स्टाइलिश फोटो मेरे लैपटॉप,मोबाइल,फेसबुक,इंसटाग्राम,व्हट्सएप्प पर उसी तरह राज कर रहे हैं जैसे तुम विश्व क्रिकेट पर नित-नए रिकॉर्ड तोड़ कर रहे हो.मैं तुम्हारा सबसे बड़ा फैन का दावा करने के लिए यह पोस्ट नही लिख रहा हूँ. सिर्फ इसलिए लिख रहा हूँ क्यूंकि हाल ही में 'नोटबंदी की प्रथम बरसी' पर तुम्हारे एक बयान ने मुझे यह पोस्ट लिखने के लिए मजबूर किया है.तुम्हारा बयान कुछ इस तरह था कि ‘नोटबंदी भारतीय राजनीतिक इतिहास का सबसे महान कदम है'.तुम मोदी जी की नोटबंदी के बारे में ऐसा बयान दे सकते हो क्यूंकि क्रिकेटर भी नागरिक हैं, इसलिए उन्हें उनकी राजनीतिक अभिव्यक्ति के लिए आरोपित नहीं किया जा सकता. क्रिकेटरों और राजनेताओं की गलबहियां कोई नई बात नहीं. कांग्रेस व भाजपा के नेता लंबे समय से क्रिकेट संघों की राजनीति करते रहे हैं. पर इसके बावजूद विराट कोहली तुम्हारा बयान अभूतपूर्व था. इससे पहले कभी किसी क्रिकेटर ने किसी प्रधानमंत्री के कदम पर इतनी जल्दबाजी नहीं दिखाई थी' आखिर हमारे क्रिकेटर राजनीति, इतिहास और अर्थशास्त्र के बारे में जानते ही कितना हैं कि उन्हें ‘नोटबंदी’ जैसे कदम पर ऐसी टिप्पणी का अधिकार मिल जाए ?
तुम्हारे fans तुम्हारी हर चीज को आत्मसात करने की कोसिस करते हैं चाहे वह तुम्हारी हेयर स्टाइल हो, मैदान पर विरोधियों के लिये तुम्हारी आक्रामकता हो,तुम्हारा बॉडी ट्रांसफॉर्मेशन हो या तुम्हारे बयान हो तुम्हारी हर चीज पर तुम्हारे fans की नजर रहती है.लोग तुम्हारी कही बातों को सीरियसली लेते हैं.तुम्हारा सफल व्यक्ति होना ही इसकी वजह भी है.एक जिम्मेदार व्यक्ति होने के नाते बिना रिसर्च के इतना बड़ा बयान कैसे दे सकते हो ? खासकर ऐसे वक़्त में जब अच्छे से अच्छे अर्थशास्त्री भी नोटबंदी को या तो असफल बता चुके है या इसके बारे में खुलकर बोलने से बचते हैं.
कहीं मोदी जी के 'भक्तों' पर तुम्हारी नजर तो नही, क्या तुम उन्हें भी अपना फैन बनाकर अपना सोशल मीडिया पर सामाजिक आधार तो तैयार नही कर रहे ? तुम्हारे इस बयान से राजनीतिक बदबू आ रही है.
नोटबन्दी के बारे में सबकुछ जानते हुए भी आलोचना न करना यह निजी साहस में कमी का मामला भी है, जो हमारे सेलेब्रेटी को भी खुलने से रोकती है. एक बार प्रसिद्धि या धन, या फिर दोनों कमा लेने के वालों को यह सब गंवाने का डर सताने लगता है इसीलिए सच बोलने में डर लगता है.और हाँ अब अगर तुम्हे नोट और बंदी दोनों मिल ही गयी हैं तो नोटबंदी का समर्थन करना बंद करो विराट.

~ तुम्हारे खेल को बहुत नजदीक से देखने वाला एक अदना सा फैन

Saturday, 4 November 2017

फेसबुक : गुलामों का अड्डा

लिखना' और 'फेसबुक पर लिखना' दो अलग अलग बातें है.लिखना एक कला है,एक नशा है,एक अच्छी आदत है पर फेसबुक पर लिखना गुलामी का प्रतीक होता जा रहा है.तुम जितना ज्यादा फेसबुक पर लिखोगे,जितना ज्यादा फेसबुक को समय दोगे तो समझ लो तुम उतने ही ग़ुलाम हो,3 साल 5 महीने से राजनैतिक मुद्दों पर लिखने लगे तो समझते हो कि तुम अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हो रहे हो.
घण्टा जागरूक हो रहे हो,चूतियापा कट रहा है तुम्हारा,2014 से पहले तो तुम नही लिखते थे अब अचानक अंदर का 'लेखत्व' कैसे जाग गया.फेसबुक पर दो पैसे की आशिकी से भरपूर शायरियाँ चेपने वाला लड़का आज एकदम से राजनैतिक विचारक कैसे बन गया ? जिसकी कोई फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट नही करता था आज उसकी फ्रैंडलिस्ट में 5000 दोस्त और 1200+ फोलोवर्स कैसे हो गए ? क्या कभी सोचा है ?
दरअसल, तुम्हारा 'लेखत्व' जागा नही है जगाया गया है,ऊपर वालो ने जगाया है अपना फायदा उठाने के लिए,वो सांप भी मार रहे है और लाठी भी नही टूटने दे रहे.फेसबुक पर लिखना 'बेरोजगारी का सबसे घृणित रूप' कब बन गया किसी को पता ही नही चला,फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उद्भव इसलिये हुआ था ताकि आम जनमानस अपनी परेसानियों को सीधे सरकार को अवगत करा सके,एक दुसरे के साथ बाँट सके,अपनी अच्छी यादों को संजो सके,बुरे वक़्त में मित्रो से दुआ ले सके,लेकिन अगर आज किसी को सरकार से कोई परेसानी है और उसे वो फेसबुक पर शेयर करे तो तुम उसे ही ट्रोल करने लगते हो.
अगर तुम्हे लगता है जो तुम सोच रहे हो वो लिख रहे हो,
नही,
तुम वो लिख रहे हो जो वो लिखवाना चाह रहे हैं,वो जानते है कि भारत का एजुकेशन सिस्टम 'क्लर्क' तैयार करता है इसलिए वो बयान देते है और तुम उन पर निबंध लिखते हो,बेजा कुतर्क करते हो लेकिन कभी ये नही सोचते कि हमारी बेरोजगारी परदे के पीछे छिपा दी गयी है ,नौकरी न मांगने लगे इसलिए नया रोजगार दे दिया है -' फेसबुक पर लिखना'
जनता तो 'भक्त' है और भक्त 'चूतिया' पहले होता है 'भावुक' बाद में,भक्त का क्या है वो एक कोरे फ़ेसबुकिया को 'लेखक' मान बैठता है और कोरा फ़ेसबुकिया अपने लक्ष्य को छोड़ के लेखक बनने का ही सपना पालने लगता है यहीं से रोजगार परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है और इसी में उनकी जीत होती है क्यूंकि वो तुम्हे तुम्हारे वास्तविक उद्देश्य से हटा चुके होते हैं .अगर तुम्हे लगता है कि तुम्हारा लिखना 'बौद्धिक विलास' है इससे तुम्हारी बल-बुद्धि विकसित हो रही है तो गलत लग रहा है तुम्हे, वास्तविकता में 'बौद्धिक जुगाली' वो कर रहे है और निशुल्क तुमसे लिखा लिखा कर ही ग़ुलामी करा रहे हैं.
किसी बकचोद ने कह दिया कि ताजमहल खूबसूरत कब्रिस्तान है तो क्या उसके कहने से कब्रिस्तान हो गया,उनकी सोच तो मुग़ल काल के बारे में जग-जाहिर है ये तुम भी जानते हो तो फिर भी इन बेवजह के मुद्दे पर क्यों लिखते हो,असल में पहले वो तुमसे ताजमहल पर बुरा-भला लिखवायेंगे और फिर तुम्हारे हाथ से ही ताजमहल को तुड़वा भी देंगे और ये सब तुम निशुल्क करोगे भी.
इसलिए 'समझदार बनो ग़ुलाम नही', तुम जितने समझदार बनोगे उनके लिए उतने ही गद्दार बनोगे,वो तुम्हे 'गद्दार' का तगमा देकर डराएंगे लेकिन डरना मत इसी 'समझदारी भरी गद्दारी' से ही कोई नया आईडिया आयेगा,और नया विकल्प आयेगा,नया आईडिया दिमाग में तब ही आता है जब कोई अकेला रहता है,अकेले बौद्धिक जुगाली करता है इसलिए कभी अकेले रहो कुछ नया सोचो वरना फेसबुक पर तो उनकी निशुल्क भाड़े पर बुलाई भीड़ ही मिलेगी और ये तुम खुद तय करो कि भीड़ के साथ जाना है या अलग खुद की बनाई राह पर क्यूंकि भीड़ तो अंत में भाड़ में ही जाती है

पहले समाज ने डराया फिर हराया.

ये तो तुम जानती ही हो क़ि मैंने तुमसे प्यार किया और तुम्हे पाने के लिए खूब कोशिस की,सोचता था कि तुम ही वो लड़की हो जिसे भगवन ने सिर्फ मेरे लिये बनाया है मतलब मेरा 'नसीब' हो तुम,
 सुना था कि कोशिशों की अधिकता के सामने नसीब को भी झुकना पड़ता है,
 इसलिए कि एक दिन तुम्हारा 'न' 'हाँ' में जरूर बदलेगा,यही सोच के तुम्हे पाने की कोशिश करता रहा,एक साल,दो साल,तीन साल,चार साल,साल निकलते रहे मैं तुम्हे पाने के लिए तड़पता रहा,अपना काम करता रहा,पर तुमने कभी नही कुबूला की तुम भी मुझसे प्यार हो,
पहले सोचा,शायद तुम किसी से उतना ही प्यार करती हो जितना मैं तुमसे करता हूँ,इसलिए तुम मुझसे प्यार नही कर पा रही
हो सकता ऐसा मेरा सोचना गलत हो,क्या पता सही भी ही,हो सकता है पूरी तरह गलत हो,क्या सच है ये सिर्फ तुम जानती हो,इसलिए
मैंने बहुत सोर्स से उस लड़के की ढूंढने की कोशिस की पर मुझे वो लड़का नही मिला.
अब जब और गहराई में जाके सोचा,पुरानी अपनी दोनों की सब यादें याद की,उस दौर को याद किया जब मैं सच में खुश रहता था तो पता चला कि तुम्हारी जिंदगी में कोई और लड़का होता तो मुझे तुम अपना इतना वक़्त क्यू देती,उसी को देती न,
जितना अपना वक़्त मैंने तुम्हे दिया उतना ही तुमने अपना वक़्त मुझे दिया.
इसलिए यह तो मान लिया कि कोई और लड़का तो नही है
तुम्हारी 'हाँ' न कहने की वजह कोई दूसरी ही है
फिर शुरू से सोचा,
 तुम्हारे आस पास के समाज को ध्यान से देखा,तुम उस समाज में रही जहां लड़कियो को पढ़ने की आज़ादी तो है,पर अपने खुद के निर्णय लेने की आज़ादी नही है,तुम्हारे पढ़ने की आज़ादी का भी तुम्हे बार बार ताना मारा जाता है जिससे कि तुम कोई नई मांग न करने लग जाओ,सिर्फ पढ़ाई की आज़ादी देके तुम्हारी सब इच्छाएं मार दी जाती हैं,
ऐसे समाज में इंसांन को 'आदर्श' बनने का सपना दिखाया जाता है,छोटे भाई-बहिन के लिए आदर्श,रिश्तेदारो के लिए आदर्श,गली मोहल्लों वालों के लिए आदर्श,हर कंडीशन में सिर्फ आदर्षता दिखनी चाहिए,कभी खुद के निर्णय लेने की पॉवर तुम्हे नही दी गयी,तुम्हारी खुद की बॉडी तुम् किसको शौंपना चाहती हो ये भी तुम्हे अधिकार नही है ये अधिकार भी तुम्हारे पिता जी के हाथों में सुरक्षित है क्यूकि शादी के लिए लड़का तो वो ही ढूंढेंगे,पता है सोशल मीडिया का तुम्हे अहसान मानना चाहिए क्योंकि आज जब भी तुम्हारा मन होता है तो तुम फोन उठाती हो और बात कर लेती हो.सोशल मीडिया न होती तो आज तुम्हारे दोस्त सिर्फ वो लोग होते जो तुम्हारे पिता जी को पसन्द होते,पिता जी की पसन्द सिर्फ लड़कियां होती उनमे भी वो लड़कियां जो उनकी लड़की की परिभाषा में एकदम फिट बैठती हो,कम बोलती हो,घर से कम बाहर निकलती हो, ऊपर से टॉपर हो,मतलब वही कि आदर्श हो,तुम्हारे इस समाज से अच्छा तो ये सोशल मीडिया है जो पढ़ाई की आज़ादी के तुम्हे पता नही और क्या क्या आज़ादी देता है,
तुम मुझसे कभी हाँ नही कहपायी पता है क्यों क्योंकि तुम्हे आदर्श बनने का सपना दिखा दिया था समाज ने,रास्ता बना दिया गया था उस रस्ते के कुछ नियम भी थे,तुम तो बस उस रस्ते पर चल रही थी,तुम उस रस्ते का कोई भी नियम नही तोड़ना चाहती थी इसलिए कभी तुम हाँ नही कहपायी,
मैंने कसम खा रखी थी कि तुम्हे पाकर रहूंगा,और मैं बहुत जिद्दी हूँ जो भी चाहता हूँ उसे पाकर रहता हूँ,फिर भी मैंने तुम्हारे केश में गिव उप कर दिया क्योंकि मैं हार गया था,तुमसे नही,इस समाज से हार गया,उस समाज से हार गया जिसने अपने ही बच्चों को अपने खुद के ही निर्णय लेने की आज़ादी नही दी.
तुमने कभी हाँ नही बोला इसमें तुम्हारी तो कभी गलती थी ही नही पूरी गलती समाज की है
समाज ने तुमसे अपने नियम मनवाने के लिए तुम्हे इस तरह से जकड रखा है कि कभी तुम मुझसे या किसी और से हाँ बोलने की सोच भी नही सकती,क्योंकि ये नियम सदियो पहले patriarchal समाज ने बनाये थे तब से ही चलते आ है
पर्सनली मत लेना ये सब,बहुत लडकिया इस कंडीशन को फेस कर रही है,जो मै सोच रहा हूँ वो मैंने लिखा,तुम्हारे पिता जी का मैंने अपमान नही किया है मैं आज भी उनका बहुत सम्मान करता हूँ उनकी गलती नही है वो भी नियमो का पालन करते आ रहे हैं.तुम्हे अगर ये नियम गलत लगते हों तो तोड़ने की कभी कोशिस करना,खुली  आबोहवा में सांस लेके देखना,बहुत अच्छा लगता  है,बाकि तुम्हारी मर्जी जिंदगी तो कट ही रही है, मेरे विचार तुम्हे गलत लगे हों तो पढ़ के डिलीट कर देना और हाँ ये विचार गलत हो सकते है पर प्यार 'सच्चा' ही था.

बताओ तो, कहाँ जाऊं ??

 मैं एक लंबी छुट्टी पर जाना चाहता हूँ,वो भी अकेला,मेरे साथ कोई न जाये बस मैं जाऊँ, इस यात्रा में मेरे दिल और दिमाग खाली जाये न दिल में मेरे साथ कोई जाये न दिमाग में कोई साथ रहे,इतनी एकांत जगह में जाऊँ जहाँ मुझे दूर दूर तक कोई भी न दिखे,मेरी आँखे थक जाये किसी को ढूंढते और फिर थक कर ढूंढना छोड़ दे, मेरी आँखे सिर्फ मुझे देखे मुझे पहचानती रहे मुझे जाने और मुझे बताये कि मैं कौन हूँ,सही और गलत के पार,झूठ और सच से परे कोई ऐसी जगह तो होगी जहाँ मैं अपने आप को खुद जान सकूँ,जहां कोई मुझे ये बताने वाला न हो कि तू ये है तुझे ये करना चाहिए,तूने ये गलत किया,क्या मेरा दिल,मेरा दिमाग, मेरी खुद की जुबान मुझे बता सकती है कि मैं क्या हूँ, मैं क्यों हूँ,मैं किस लिए हूँ, मई किसके लिए हूँ,क्या मैं खुद से थक रहा हूँ, क्या मैं खुद से भाग रहा हूँ या मुझे डरा के भगाया जा रहा है या जबरदस्ती अहसास कराया जा रहा है कि तू थक गया है अब बस वो कर जो हम कहें,तुम्हारे कहने से ही तो अब तक मैं सबकुछ करता रहा हूँ, तुम अपने आप को नही पहचान रहे या मैं अपने आप को नही पहचान रहा,तुम अपने आप को देखो मुझे क्यों देखते हो,मेरे लिए औरो को क्यों देखते हो,मेरी तुलना दूसरो से क्यों करते हो और तुलना करके मुझे परिणाम क्यों बताते हो और मेरा परिणाम हमेसा बुरा क्यों बताते हो,मुझे चले जाने दो,मुझे जाने के लिए तुमसे उस जगह के बारे में भी नही पूछना,वो मेरी जगह है मैं खुद ढूंढ लूंगा,अब तो वो जगह भी मुझे बुलाने लगी है,तब ही तो हर समय काले कागज पर काले पेन से अपना पता लिख देती है और कहती है ढूंढ ले इसमें अपना रास्ता और आजा और जान ले तू कौन है ?
क्या मैं पागल हो रहा हूँ, ऐसा तो नही सही होने के लिए पागल हो रहा हूँ या ऐसा भी हो सकता है की तुमने पागल कर दिया हो बस अब सही होना चाह रहा हूँ,मैं खुद से क्यों इतनी बाते करता रहता हूँ खुद से बाते करके हो क्या जायेगा मेरा, मुझे क्यों अच्छा लगता है खुद से बाते करना,कहीं खुद से बाते करके मैं अपना समय तो बर्बाद नही कर रहा,वैसे मैं तुमसे बाते करके ही क्या सीख जाता,क्या उखाड़ लेता इस दुनिया का तुमसे बात करके,मैं शांत क्यों नही रह पाता, दिन हो या रात हो किस चीज की हडबडी मची रहती है मुझे,ऐसा तो नही कोई मेरी प्रिय चीज मुझे नही मिली हो उसकी कमी तो नही खलती मुझे,

पहनने के लिए कपड़ा है,रहने के लिए घर है,माँ है बाप है भाई बहन सब तो है,फिर किसकी कमी खल रही है मुझे,मैं क्यों उस एकांत जगह में जाना चाहता हूँ,अगर वहां चला गया वहां भी तुम्हारी कमी पूरी नही हुई तो ?
ये इतनी चिंता क्यों होती है मुझे,मैं रिस्क लेने से डर क्यों रहा हूँ,क्या डर रहा हूँ इसलिए ही तो इतना बेचैन तो नही हूँ.तुम्हारे जैसे और भी तो लोग है मेरी जिंदगी में क्या वो तुम्हारी कमी पूरी नही कर पर रहे हैं,
क्या वो तुम्हारे जैसे नही है, तुम्हारा जैसा सर्फ एक तुम हो ?
बताओ तो तुम्हे मैं कहाँ ढूंढू ?

Wednesday, 21 December 2016

कब तक अम्बेडकर

'सक्रिय राजनीति में जैसे जैसे दलितों की संख्या बढ़ेगी , वैसे वैसे दलित उत्थान की संभावनाओं को मजबूती मिलेगी'-ऐसा मैं कुछ समय पहले तक सोचता था, लेकिन अब मुझे इस विचार पर संदेह होने लगा है, कारण है, मुझे उच्च जातियों और उनके तथाकथित नेताओं से तो आशा नहीं थी , पर विराट संघर्ष करके राजनीति में आये दलित नेताओं से यह आशा थी कि वे बेहतर नेता के साथ साथ बेहतर  मनुष्य बन कर दिखाएँगे, वो बाबा साहेब के सिधान्तो पर चलने का प्रयास करेंगे, संविधान में बाबा साहेब के लिखे अधिकार लेकर ही दम लेंगे, पर हुआ इसके एकदम उलट, दलित नेताओं की तो कार्य संस्कृति ही बदल चुकी है, मायावती जी को ही ले वह दलित उत्थान की  बात अब सिर्फराजनीतिक फायदे के ही लिए करती है, इससे तो बेहतर था कि वो किसी गाँव में रहती और गाँव के लोगों में आधुनिक चेतना का संचार करती।'
अब प्रश्न यह उठता है की क्या दलितों का सत्ता में आना बुरा है ? 
'माफ कीजिए, आप मेरी बातों का उलटा अर्थ लगा रहे हैं। कहीं आप सवर्ण तो नहीं हैं? मैंने कब सत्ता का विरोध किया ? मैं तो चाहता हूँ कि दलित बड़ी संख्या में सत्ता में आएँ। इसके बिना उनकी हालत सुधर नहीं सकती। यही सोच कर पूना पैक्ट को आंबेडकर जी ने  स्वीकार कर लिया था। लेकिन दलित भी सत्ता का उपयोग उन्हीं उद्देश्यों के लिए कर रहे है , जिनके लिए सवर्ण जातियाँ सत्ता का उपयोग करती हैं, तब तो साधारण दलितों की हैसियत बदलने से रही। भेड़ों की पीठ पर चढ़ कर एक भेड़ ने आसमान छू लिया, तो इससे नीचे की भेड़ों को क्या मिला? उन पर तो नेता का बोझ ही बढ़ा। यह बोझ वे कब तक उठाते रहेंगे ?'
रही बात इस मिटटी को आंबेडकर की जरुरत की तो लगभग हर 10वे पार्क और चौराहे पर तो आंबेडकर विराजमान है ही, खैर छोडो, हमें क्या हमें तो चाय पी के सोना है, रात भी बहुत हो चली है सोता। मेरा देश तो लगातार बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है

माफीनामा

किसी को किसी की गलती से हुई भूल के लिए माफ़ ना करना ठीक वैसा ही है जैसा जहर खुद पीना और उम्मीद करना कि इसका प्रभाव दुसरे पर हो, हो सकता है जब भूल हुई हो उस समय उस इंसान को साथ ऐसी परिस्थितियां ने घेरा हुआ हो जहाँ इंसानी दिमाग काम करना बिलकुल बंद कर देता है,इंसान क्षण भर के लिए स्वार्थी हो जाता है लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि ये उस इंसान का वास्तविक स्वभाव है,अगर अपराधी का इतिहास अच्छा है और गलती से कोई क्रोधवस कोई भूल कर देता है तो सुप्रीम कोर्ट भी उस अपराधी की सजा कम कर देता है, Sacrifice करने से व्यक्ति अपने लक्ष्य तक पहुँचता है, पहले यही सोचता था लेकिन sacrifice करने से अपनी खुसी दिन ब दिन मर रही हो तो उस sacrifice की भी कोई value नही होती,ऐसा sacrifice धीरे धीरे frustration का रूप ले लेता है,माफ़ करना अँधेरे कमरे में रौशनी करने जैसा होता है,इस रौशनी से गलती करने वाले व्यक्ति को इतना प्रकाश मिलता है कि उसे अपनी अच्छाइयों को साबित करने का एक और मौका मिल जाता है,अकेलापन तो पहले से ही था अब निरर्थक sacrifice ने अधूरापन उपहार में दे दिया,और भूलवश की हुई गलती से उत्पन्न हुआ अधूरापन अकेलेपन से मिल जाये तो इंसान की स्थिति बद से बदतर होती जाती है,आज हर सेकंड जब तुम्हारी कमी खलती है तो तुम्हारी जरुरत महसूस होती है, तुम्हारी जरुरत ही मेरा तुमसे आकर्षण है और इस आकर्षण से ही लक्ष्य को पाया जा सकता है बस,माफ़ करना और ना करना, निस्संदेह ये तुम्हारा निर्णय है, लेकिन सिर्फ एक भूलवश और भविष्य के अज्ञान से लिये गए sacrifice वाले निर्णय से हमारी दोस्ती को मत तोलना,स्वार्थी नही सहयोगी बनने का प्रण लिया था,लेकिन इंसान हूँ,परिस्थितियां ऐसी थी हो गयी गलती, अगर कर सको तो माफ़ कर दे